भगवान के साथ झगड़ा: रवि की हंसी-ठिठोली भरी कहानी
एक दिन रवि अपनी माँ, सुशीला, के पास गया। उसने बहुत ही उदास स्वर में कहा, “माँ, मुझे नहीं लगता कि भगवान सच में हैं। मैं जब भी कुछ नया शुरू करता हूँ, मुझे सिर्फ असफलता ही मिलती है। मैंने अच्छा रोडमैप बनाया, अच्छी रणनीति बनाई, फिर भी कुछ नहीं होता। मैं अब भगवान पर विश्वास नहीं कर सकता।“
सुशीला ने हंसते हुए कहा, “अरे, बेटा! भगवान कोई मैजिक वैंड थोड़ी हैं जो घुमा दिया और सब सही हो गया। ये जीवन है, यहाँ मेहनत और धैर्य से ही सब कुछ मिलता है।“
रवि ने तुनकते हुए कहा, “माँ, ये भगवान सिर्फ कहानियों में अच्छे लगते हैं। वास्तविक जीवन में तो उन्होंने मुझे हमेशा निराश किया है।“
सुशीला ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे मेरे भोले बालक, भगवान भी सोचते होंगे कि रवि को थोड़ा और संघर्ष करने दो, ताकि वो और मजबूत बने। ये तुम्हारी परीक्षाएँ हैं, जिनसे तुम और बेहतर बनोगे।“
रवि ने थोडी निराशा से कहा, “लेकिन माँ, मैं तो हर बार असफल हो रहा हूँ। मुझे लगने लगा है कि भगवान मेरे साथ मज़ाक कर रहे हैं।“
सुशीला ने एक गहरी सांस ली और कहा, “बेटा, जब तुम बच्चा थे और पहली बार चलने की कोशिश कर रहे थे, तब कितनी बार गिरे थे? क्या तब भी तुमने चलना बंद कर दिया था?”
रवि ने सोचा और जवाब दिया, “नहीं माँ, लेकिन तब मुझे पता था कि आप और पापा मुझे पकड़ लेंगे।“
सुशीला ने हंसते हुए कहा, “और अब भी तुम्हें पकड़ने वाला कोई है – भगवान। वे तुम्हें गिरने दे सकते हैं, लेकिन छोड़ेंगे नहीं। गिर-गिर कर तुम ही मजबूत बनोगे। और वैसे भी, अगर हर चीज़ में सफलता मिलती रहती तो जीवन में मज़ा कहाँ आता?”
रवि ने थोड़ी सी मुस्कान के साथ कहा, “ठीक है माँ, मैं एक बार फिर से कोशिश करूंगा। लेकिन अगर इस बार भी असफल हुआ तो भगवान को सच में शिकायत करूंगा।“
सुशीला ने हंसते हुए कहा, “शिकायत कर लेना, लेकिन याद रखना, भगवान भी तुम्हारी शिकायतें सुनकर हंसते होंगे और कहते होंगे, ‘चलो, रवि को एक और मौका देते हैं।‘”
रवि ने अपनी माँ को गले लगाया और फिर से अपने नए सफर पर निकल पड़ा। उसने ठान लिया था कि इस बार वह हार नहीं मानेगा, चाहे भगवान उसकी परीक्षा लें या नहीं। और सुशीला, उसे देखती हुई, बस मुस्कुरा दी, यह जानते हुए कि उसके बेटे में फिर से विश्वास जाग गया है।
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